सब गूंगे हैं, सब बहरे हैं,
सब लिये मुखौटे चेहरे हैं
सब सीना तान सिकन्दर हैं
सब गांधी जी के बन्दर है
तू औरत है, चुपकर, चुपकर
बैठेगी क्या सिर के ऊपर?
हमसे बचने की युक्ति नहीं
ओ नारी तेरी मुक्ति नहीं
सरदार हैं हम गुटबाजी के
हम चैंपियन लफ्फाजी के
हम ज्ञान बांटते मूरख है
दिल के काले पर हंसमुख हैं
कोई जुबान कैसे खोले?
गुट से बाहर कैसे बोले?
जो होता है वो होने दो
हम सबको मुर्दा सोने दो
टेड़ो टेडो चले, जब, प्यादा बने वज़ीर
ये अन्धों का गांव हैं, बोले दास कबीर
जनवरी 2, 2010 को 9:10 पूर्वाह्न पर
बढ़िया रचना!
जनवरी 2, 2010 को 4:51 अपराह्न पर
धन्य हुए!!