हरी भई बनराइ

कबिरा बादल प्रेम का, हम परि बर्ष्या आइ
अंतरि भीजी आत्मा, हरी भई बनराइ

साधो, प्रेम के बादल में भीगो.  तुम्हारे अंदर की आत्मा, तक इससे भीग जायेगी.
तुम अभी ज्ञान पोथी की जो बातें कर रहे हो, वो सब भूल जाओगे.

तुम कहते तो रोमिल्ला थापर ने ये कहा था!
तुम कहते हो कि आर्य फलां जगह से आये थे!
तुम कहते हो हिन्दू जैन बोद्ध ये नहीं वो हैं!

साधो, इतिहास के मुरदे के साथ कब तक बलात्कार करते रहोगे ? अरे भूल जाओ इन सबको और आज की बात करो.

गये गुजरे जमाने के पीछे तो वो लोग चिपकते हैं जिनका वर्तमान मर चुका होता है.  जो इतने अशक्त हो चुके होते हैं कि कुछ भी करने के काबिल नहीं होते.  क्या तुम इतने अशक्त हो?

आज की बात करो, प्यार की बात करो.

धरम की बात तो वो करते हैं जिनके पास करने को कोई काम नहीं होता.  पेट में रोटियां होती है, जेब में पैसे.  भूखे आदमी का कोई धरम नहीं होता.  साधो, ये भरे पेट की उछल कूद है. चलो अपना अपना चरखा उठाओ, की बोर्ड उठाओ और बुनाई शुरू करो.  अपने अपने औजार खटखटाओ.

अपनी अन्तरआत्मा को भिगो डालो, और देखो कैसे हरियाते हो.

कबिरा बादल प्रेम का, हम परि बर्ष्या आइ
अंतरि भीजी आत्मा, हरी भई बनराइ

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4 Responses to “हरी भई बनराइ”

  1. paramjitbali Says:

    कबीर वाणी पढकर मन प्रसन्न हुआ।


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